
अनामिका (महिला अस्तित्व जागृति) फॉउंडेशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मंजु गुप्ता कछावा ने लोकतांत्रिक सुधार की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल करते हुए “जनप्रतिनिधि चुनावी वचनभंग एवं उत्तरदायित्व व्यवस्था” विषय पर एक विस्तृत श्वेतपत्र (White Paper) तथा “जनप्रतिनिधि चुनावी वचनभंग एवं उत्तरदायित्व अधिनियम” का प्रारूप जारी किया है। इस अभियान का मुख्य संदेश है—
“‘अनशन’ नहीं, ‘राईट टू रिकॉल'”
डॉ. मंजु ने कहा कि भारत में मतदाता चुनाव के समय विभिन्न राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों द्वारा किए गए सार्वजनिक वचनों, घोषणापत्रों और चुनावी आश्वासनों पर विश्वास करके पाँच वर्षों के लिए अपने सांसद और विधायक चुनते हैं। किन्तु यदि चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि अपने प्रमुख चुनावी वचनों से मुकर जाते हैं अथवा उनके विपरीत कार्य करते हैं, तो वर्तमान व्यवस्था में मतदाताओं के पास अगले चुनाव की प्रतीक्षा करने अथवा जनजागरण, धरना, प्रदर्शन और अनशन जैसे लोकतांत्रिक उपायों का ही सहारा रहता है। चुनावी वचनभंग की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष सुनवाई के लिए वर्तमान में कोई संवैधानिक संस्थागत व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।
इसी लोकतांत्रिक रिक्ति को दूर करने के उद्देश्य से फॉउंडेशन ने संविधान संशोधन द्वारा भारत निर्वाचन आयोग के समान संवैधानिक दर्जा, स्वतंत्रता एवं स्वायत्तता प्राप्त “जनप्रतिनिधि उत्तरदायित्व आयोग” की स्थापना का प्रस्ताव रखा है।
प्रस्ताव के अनुसार यह आयोग केवल सांसदों और विधायकों के विरुद्ध चुनावी वचनभंग से संबंधित शिकायतों की सुनवाई करेगा। आयोग शिकायतकर्ता तथा संबंधित जनप्रतिनिधि—दोनों को सुनवाई का पूरा अवसर देगा, साक्ष्यों और अभिलेखों का परीक्षण करेगा तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर निर्णय देगा। यदि गंभीर एवं प्रमाणित चुनावी वचनभंग सिद्ध होता है, तो आयोग संबंधित जनप्रतिनिधि को उसके निर्वाचित पद से पदच्युत (Right to Recall) कर सकेगा।
डॉ. मंजु ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित आयोग किसी सरकार को भंग नहीं करेगा और न ही किसी राजनीतिक दल के अस्तित्व पर निर्णय देगा। उसका अधिकार केवल दोषसिद्ध जनप्रतिनिधि तक सीमित रहेगा। यदि किसी राजनीतिक दल के अनेक जनप्रतिनिधि क्रमशः चुनावी वचनभंग के कारण पदच्युत होते जाते हैं, तो उस दल का संसद अथवा विधानसभा में प्रतिनिधित्व स्वाभाविक रूप से कम होता जाएगा। यदि संबंधित राजनीतिक दल जनता से किए गए अपने चुनावी वचनों के पालन की दिशा में सुधार नहीं करता, तो वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप अपना बहुमत खो सकता है अथवा अल्पमत में आ सकता है।
डॉ. मंजु ने कहा कि यह प्रस्ताव प्रत्यक्ष मतदान आधारित राईट टू रिकॉल का नहीं है। भारत में मतदान गुप्त मतदान (Secret Ballot) के सिद्धांत पर आधारित है, इसलिए यह निर्धारित करना संभव नहीं है कि किसी जनप्रतिनिधि को चुनने वाले मतदाता कौन थे। ऐसे में प्रत्यक्ष रिकॉल मतदान की व्यवस्था व्यावहारिक कठिनाइयाँ उत्पन्न करती है। इसलिए फॉउंडेशन ने एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष संवैधानिक आयोग के माध्यम से आयोग आधारित राईट टू रिकॉल की व्यवस्था का प्रस्ताव किया है।
उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य सरकारों को अस्थिर करना नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों को जनता के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाना है। यह व्यवस्था राजनीतिक दलों को भी अपने चुनावी घोषणापत्रों और सार्वजनिक वचनों के पालन के प्रति अधिक गंभीर बनाएगी। परिणामस्वरूप लोकतंत्र में जनता का विश्वास, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की भावना अधिक सुदृढ़ होगी।
डॉ. मंजु ने बताया कि इस विषय पर तैयार किए गए 10 अध्यायों वाले श्वेतपत्र में लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था, राईट टू रिकॉल की अवधारणा, प्रत्यक्ष रिकॉल की व्यावहारिक सीमाएँ, जनप्रतिनिधि उत्तरदायित्व आयोग की आवश्यकता, आयोग की संरचना, शिकायत प्रक्रिया, सुनवाई, पदच्युति के प्रभाव, संभावित आपत्तियों के समाधान तथा प्रस्तावित संवैधानिक सुधार का विस्तृत खाका प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही “जनप्रतिनिधि चुनावी वचनभंग एवं उत्तरदायित्व अधिनियम” का विधिक प्रारूप भी तैयार किया जा रहा है, जिसे व्यापक राष्ट्रीय विमर्श के लिए सार्वजनिक किया जाएगा।
फॉउंडेशन ने देशभर के नागरिकों, सामाजिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों एवं जनप्रतिनिधियों से इस प्रस्ताव पर अपने सुझाव एवं समर्थन देने की अपील की है। इच्छुक नागरिक अपना समर्थन व्हाट्सएप नंबर 9321175727 पर भेज सकते हैं तथा इसी नंबर के माध्यम से व्हाट्सएप समूह से जुड़कर इस संवैधानिक सुधार अभियान का हिस्सा बन सकते हैं और व्यापक जनमत निर्माण में अपनी सहभागिता निभा सकते हैं।


















